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لال کتاب شُکر جانہ نمبر ۱۲-लाल किताब शुकर ख़ाना नम्बर १२

لہر مایا چلتی پھرا کُل زمانه-گیا بھُول کیوں پھر تو جس گھر کو جاناـ
آڑے وقط حر خفه مدد کی محبم دیوی اور بھوساگر سے پار کرنے والی گؤ★
खाणा ऩ 12 का शुकर वाला टेवे की औरत की सेहत जब जब खराब होगी व औरत को दुखी करेगा[टेवे वाला अपनी औरत को] ये मंदे दिनो की निशाणी होगी.......औरत को खुशमिज़ाज व सेहत का खयाल रखणा मसले का हल होगा-
सुरज असत के वकत नीले फूल दफ़न करना मुबारक़ होगा-
औरत की हुयी इबादत व दिया गिया ज़कात वासते शौहर वकते मुसीबत लाहेवंद होगा॥

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بابا بُلھے شاھ -बाबा बुल्लेह शाह

पढ़ पढ़ किताबां इल़म दीयां तु नाम रख लिया क़ाज़ी.
हथ विच फढ़ के तलवार नाम रख लिया ग़ाजी.
मकके मदीने घुम आया ते नाम रख लिया हाज़ी.
ओ बुललेया हासल की कीता? जे तुं रब ना कीता राजी..[बाबा बुललेह शाह]

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मन तु जोत सरूप हैं, अपना मूल पछाण॥

एक प्रचलित कथा है कि जब श्री कृष्ण
जी कालिया नाग का मर्दण किया-अंहकार
तोड़ दिया तो कालिया नाग श्री कृष्ण
जी के चरणों में गिर पड़ा और हे भगवन! मुझे माफ
कर दें मै नीच आपको पहचान नही पाया॥
श्री कृष्ण जी बाकी दुसरे जीवों को परेशाण
न करने की शर्त पर क्षमा कर दिया, पर
कालिया नाग के नाग के मन में एक प्रश्ण
उत्पन्न हुआ कि मैं सर्प जाति का होने के
कारण ही मेरा स्वभाव ही ऐसा है/मन
हमेसा क्रोधित रहता है सो क्यों न श्री कृष्ण
जी वरदान मांग लूँ कि मेरा पापी मन निर्मल
हो जाये॥
सो कालिया नाग ने श्री कृष्ण जी से
विनती करते हुये कहा जब आप ने मुझ पापी पर
इतनी कृपा की है तो एक और कृपा करें/वर दें
कि "मेरा मन निर्मल हो जाये"॥
श्री कृष्ण जी कालिया नाग को कहने लगे
किसीे के मन को बदलना मेरे वश का नही है,
कहने लगे अगर ऐसा मेरे वश का होता तो मैं अपने
मामाश्री कंस व बाकी दुसरे दुष्टों के मन
को कब का बदल देता व इतनी परेशाणीया न
होती, सो कालिया अगर तुम इस पापी मन
को निर्मल करना चाहते हो तो तुम्हें खुद उस
पारब्रह्म परमात्मा की भजन
बंदगी करनी होगी व इसी से तुम्हारा मन
निर्मल होगा॥
सो मन को निर्मल करने के लिये
परमात्मा की भजन बंदगी इबादत करना बहुत
जरूरी है॥

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कर भला हो भला

بلّھیا! کؤن کیھندا رَب نھیں ملدہ.
رَب نھیں ملدے اُلّوُ دے پٹھیاں  نو.
बुल्लेयाह! कौन कैहन्दा रब्ब न्हीं  मिलदा?
            रब्ब न्ही मिलदै ऊल्लू दे पठ्ठेया नुं॥

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मंदा सनीचर

सनीचर मंदा होने के पीछे गुरू व शुकर का हाथ होता है, जब तक गुरू न हटेगा बात बनेगी नही,बुध+शुकर जब इकठ्ठे होंगे तभी सनीचर  सिर उठा कर दुनिया को देखे/नज़रे इनायत करे वर्ना मूहँ खावे ते आंखे शर्मावे वाली बात तो सनीचर करेगा नही। गुरू को हटाने के लिये बुध का परभाव बढ़ाना मुनासिब होगा वरना गुरू शिव शंभू ढाह कोठे ला तंबू वाली हालत बना रखेगा॥

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क्या यही ज्योतिष है!

आजकल ज्योतिष में कुछ नयापन देखने को मिल रहा है......
     जैसे कि वैदिक ज्योतिष अनुसार कुछ अनिष्ट योग/दोष होते हैं, अंगारक दोष, मंगलीक, श्रापित दोष,कालसर्प दोष,चन्डाल, दरिद्र, अशुभ, शाढ़ेसाती, गन्डमूल व इत्यादि इत्यादि उस पर चलित कुन्डली, नंवाश कुन्डली, षोडषांश -अष्टक वर्ग -सुदर्शन /ग्रह चक्र और भी कई तरह की कुंडली व चक्र बनाकर ३०० से भी अधिक योग/दोष बनते हैं व हमारे ज्योतिष मित्र भी कम से कम ४/५ भयंकर दोष तो निकाल ही देते हैं D1चार्ट से लेकर D80 (मैनें तो सुना है D120/160 Chart भी होता है) तक गोता लगाकर कुछ न कुछ कंकर पथ्थर निकल ही आता है क्योंकि जो जितना बड़ा भयंकर दोष निकाल देवे वो उतना बड़ा जानकार, चलो कोई बात नही हम तो हर इल्मकारों की इल्म को सलाम करते हैं.
    जातक तो हमेशा अपना समस्याओं  का बाढ़ तो लेकर ही आता है पर जब अपनी कुन्डली में आई हुई इस सूनामी का पता चलता है तो जातक सभी समस्याओं को भूलकर इन भयंकर दोषों के चक्कर में उलझ जाता है, अब जातक कहता है जी जैसे भी हो कुछ करो/ दोष से छुटकारा दिलवाओ ,जब समाधान की बात आती है तब एक और बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है कि समस्या का समाधान कैसे किया जाये?
   अभी तक ज्योतिषी जी वैदिक पोथी पत्री को बांच रहे थे व तरह तरह के दोष ऐसे निकाल रहे थे जैसे कि आजकल कांग्रेस मोदी की बाल की खाल उतार रही है, पर जब समाधान का समय आया लाल किताब निकाल लिये व ऐसै ऐसे दोष का उपाय/टोटके बताने लगे जिसके बारे में लाल किताब में अलफ़ बे तक नही लिखा है. क्योंकि वैदिक ज्योतिष में टोटके होते नही, वैदिक मंत्र तंत्र यंत्र यज्ञ तप तर्पण इत्यादि का विधान और इस के लिये बहुत पैसा व समय भी खरचा करना पड़ता है २१०० से १२५०० सवा लाख तक का खरचा आता है। हर आदमी चाहता है कि सस्ते से सस्ते में काम हो, जब ज्योतिष में सस्ते की बात आती है तो सबसे पहले लाल किताब नज़र आने लगता है।
    सो ज्योतिषी जी जातक से इन भयंकर दोष बताने का ११०० सौ दक्षिणा लेकर लाल किताब से(कुछ मनगढ़ंत बातें भी ) इन सो कथित भयंकर दोष की शांति के लिये २१ रूपया वाला बता कर चलते बनते हैं।
   पर जब उपाय करने बाद भी कोई फरक नही पड़ता-हालात जस के तस बने रहतें हैं फिर लाल किताब पर ही शक़ करने लगते हैं॥ जो बिमारी नही उसका इलाज कैसा!!!!

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ऱाहु ख़ाणा न.२

خانہ نمبر۲ کا راھو صافی کے باعد دھن دینے والا گرھـ
ख़ाना न: २ का राहु ससुराल में धण व अमीरी का मालिक़ ....बशरते गुरु नीच न हो.
पर जीवन साथी का मंगल ऊच होने पर औलाद की परेशाऩी से जूझता रहे.

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गर्भ कुंडली

गर्भ कुंडली बनाने के कुछ रहस्य-हमल का सही समय पता करना.
औरत जब गर्भ धारण करती है उससे पहले हुये २ माहवारी की तारीख़ का पता करो ,उन तारीख़ो में जितना फऱक हो-अमूमन माहवारी २८ वें दिन होती है पर कमजोर औरतों को जल्दी जल्दी भी हो जाती है। दोनो माहवारी की तारीख़ो में जितने दिन का फऱक हो, उसे दस से ज़रब-गुणा कर दें, जितने भी हिन्दसा मिले- वही दिन बच्चे का जन्म दिन होगा इस तरीके से सूरज के साथ साथ बाकी गरह व यहाँ तक कि चंदर भी स्पष्ट हो जावेगा॥
        मसलन 27 दिन का फऱक मालूम चले तो २७×१०=२७० हुआ, यानि जिस औरत की गर्भ से पहले हुई दो माहवारी में २७ दिन का फऱक होगा उस औरत का बच्चा २७० वें  दिन(नौवें महीने) पैदा होगा।ये पक्के असूल हैं॥
      अब जिस दिन/जिस समय बच्चे जनम हो वहाँ से २७० तारीख़ पीछे घुमावें व जो २७० दिन पीछे जाकर जो भी तारीख आवे वही तारीख़ बच्चे की गर्भ में ठहरने का तारीख़ होगी।
        अब जिस दिन बच्चे का जनम होवे, उसी दिन जिस समय बच्चे का जन्म हो/वही समय बच्चे का गर्भ में ठहरने का समय होगा॥
         अब औरत जहाँ गर्भवती हुई वही जनम का स्थान होगा मसलन औरत अगर अमेरिका में गर्भवती हुई व बच्चे को जनम इंडिया में आकर दिया तो भी बच्चे की गर्भ कुंडली में जनम स्थान अमेरिका ही माना जावेगा॥
   गर्भ कुंडली से जिन्दगी के हालात के बारें में और भी बेहतर तरीके जाना जा सकता है॥
(Copy &Pest वाले मित्रों से मेरी अनुरोध है कि यह तरीका मैने लालकिताब की रोशनी व अपने निजी अनुभव से जो मैनें महसूस किया है, उसे पूरी इमानदारी से आप सभी ज्योतिष प्रेमियों के सामने रखा है/काॅपी पेस्ट करने वाले ज़नाब हर तरह के सवाल-जवाब के लिये खुद जिम्मेवार होंगे)
धन्यावाद
نجومی دلجیت سنگھ
(Najoomi Daljiet Singh)

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शुक्र ख़ाना न:५ वाले को स्वर्गीय पन्डित रूप चन्द जोशी जी ने घर वालों के मरजी के ख़िलाफ हो कर शादी करने से क्यों मना किया है?


" अगर आशिक़ दुनिया हुआ तो फंसे हुये पतंग(शुक्र की पतंग रेखा-आसमानी इन्द्र धनुष शक्ल की रेखा {शुक्र वल्य} एक तरफ गुरू व शणी की उंगली में फसा दुसरी तरफ बुध व सुरज की उंगली में फसा हुया/ जिसे हम हस्त रेखा में शुक्र वल्य कहते हैं) की तरह क़िश्मत का हाल हो। लेकिन अगर सूफ़ी हुआ तो भव सागर से पार हो। वर्ना, एक को क्या रोते, यहाँ तो आवा ही ऊत ही गया।
    ख़ाना न:५ पक्का घर गुरू का मालिक सूरज , अब यहाँ शुक्र ;गुरू व सूरज के घर बैठा है। पर अब यहाँ आशिक़ी इतनी दूर है,जितनी लम्बी खजूर है वाली हो गई, क्योंकि गुरु तो ठहरा त्यागी साधु बाबा, अब साधु बाबा का तुम्हारी (टेवे वाला)आशिकी में मदद करना खुद चोले में दाग लगवाने वाली बात है, गुरू एसा हरग़िज न चाहेगा-
सुरज(पिता) तो वैसे ही आशिकी बदचलनी के खिलाफ है और शुक्र का ख़ासम ख़ास दोस्त शणी का तो वैसे ही सूरज से ३६ का आंकड़ा है. शणी सूरज के घर कोई दख़लअन्दाज़ी करेगा नही, अब शुक्र करे तो करे/ तो शुक्र ने सोचा क्यों #अपना हाथ जगननाथ; आपण हथ्थीं आपणा आपे ही काज सवारीए# वाला काम कर लें।
    सो शुक्र ने आशिक़ी का रास्ता अख्तियार करते हुये सुरज के घर में सूरज के असूलों से बगावत कर दी(मन मर्जी से शादी कर ली व रंगरेलीय़ां मनाने लगा)-
सुरज के आंखों तले हुई इस चोरी व सीनाजोरी ने सुरज को शर्मिन्दा कर दिया व सुरज(पिता) से ये देखना सहन न हुआ( सूरज ने सोचा था कच्ची उड़ती फिरती मिट्टी(शुक्र) अब मेरे घर आकर आग में तप कर टिक गई, पर जब शुक्र ने आंधी का रूख अपनाया(आशिकी व बगावत करी) सुरज ने सिर नीचे कर लिया(दिन दिहाड़े इश्क़मिजाज़ी,दिन में संभोग सुख को अपने घर देख कर)-आंखे मूंद ली/अस्त हो गया/मंदा हो गया।
अब सूरज मंदा होने का मतलब ख़ाना नम्बर १ (पक्का घर सूरज) गरहों पर बुरा असर पड़ना भी हुआ, इधर गुरू ने भी शुक्र की इस बदचलनी को अपने पक्के घर में होते देख कर आंखे फेर/टेड़ी की तो ख़ाणा न:९ के ग्रहों पर मंदा असर पड़ा मसलन "जो ग्रह पहले नौवें अन्धा काना हो" ख़ाना १-९ के गरह अंधे काने गये। टेवे वाला बेऔलाद तो न होगा पर औलाद (केतु) मददगार न होगी।
   शुक्र की मनमानी की वजह से सूरज(पिता)-गुरु( गुरू के रिस्तेदार राहु[ससुराल]मंगल(बड़ा भाई व ताऊ) व केतु (गुरू का चमचा बना रहा)- सब मंदे हुये...इसे कहते है यहाँ एक को क्या रोना सारा आवा ही ऊत गया।
   अब यहाँ टेवे वाले(शुक्र ५) को शनी मित्र (कारोबार मंदा न होगा) की मदद मिलती रहेगी पर कहते है न गुरू बिना गत नही शाह(मालिक) बिन पत(इज्जत)नही; आदमी के सब गरह ठीक हो अगर सूरज(सबका मालिक) मंदा हो तो कोई न कोई परेशानी बनी रहती है, सो घर के मालिक पिता(सूरज) को मनाना बहुत जरुरी है।
     अब यहाँ सूरज(पिता)को मनाने के चंदर(माता) की मदद निहायत जरूरी है....पर पहले खुद का चाल चलन ठीक करना होगा - इश्क मिज़ाजी छोड़ना होगा।
Additional[ जब शुक्र ने सुरज के घर(ख़ाना न:5) में मन मरजी(आशिक़ी) से शादी किया तो पिता(सूरज) की बेइज्जती( दिन के उजाले किया संभोग तो कटे पर नमक -शुक्र आशिक तो ऐसा करेगा ही)हुई, सुरज का सिर झुका/अस्त मंदा हुआ-सूरज की मर्यादा व गुरु की परम्परा दोनो का हनन हुआ- सुरज गुरू मंदे की वजह से दोनो के घर(ख़ाना न:१व९) बैठे ग्रह भी बरबाद हुये व पक्का घर मंगल(खाना न1)-ख़ाना न:८ मित्र शणी(कारोबार धण) तो ठीक ही रहा पर ख़ाना न:१२ का गुरू+राहु(ससुराल मंदा हुआ) ख़ाना भी जला।
      शुक्र की बदचलनी ने कितने घर बर्बाद/आवा ही ऊत गया। पर अब पिता सूरज को मनाने के लिये माता चंदर(ख़ाना न:4) की मदद चाहिये क्योकि बहु/जवांई(बेटा-बेटी का घर बसता  को देख कर )पर सबसे ज्यादा मां ही खुश होती है/मां ममता के वस हो कर सारी बातें भूल जाती है। बाप को मनाने के मां(चंदर)-बुध(बहन बुआ मौसी) मदद ही काम आयेगी।]
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फिटकरी को (शुद्ध)सोधने का तरीका

कच्ची फिटकरी को तोड़ कर चावल के दाने जैसा दरड़ कर लेवें फिर फिटकरी को गैस या चूल्हे पर लोहे के तवे में गरम करें, फिटकरी गरम करने पर बिलकुल पानी जैसा हो जावेगा फिर धीरे धीरे नीचे से सूखने लगेगा फिर चाकू की मदद से फिटकरी को उलट दें जिससे दोनो तरफ सेकने से फिटकरी पुरी तरह से भुन जायेगी,भुनी हुई फिटकरी हाथ से मसलने पर आराम से पाउडर बन जायेगा फिर इस पाउडर से उगंली की मदद से रोजाना दांत साफ करे, इससे बुध ठीक तो होगा ही साथ में दांत की कमजोरी भी दूर होंगी॥
भुनी हुई फिटकरी ही दन्तमंजन के रूप की जाती है, कच्ची फिटकरी नही॥

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तेरी रहमत पे मेरे गुनाहों को नाज़ है

‌ بسم الله الرحمن الرحيم(الله رحمت کرنے وآلہ ہے)

جب دانت نہ تھے تو دُودھ(چندرمہ) دیا کیا اَب کھانے(زر و مایا-شنیچر+شُکر) کو نہ دیگاـ

परमात्मा दयालू, आनन्द स्वरूप व सर्वत्र विराजमान है॥

जब दांत न थे तो दूध(चंदरमा) दिया, क्या अब खाने(माया ओ जर-शुकर, शनी) को न देगा॥
       परमात्मा लाख लाख तेरा शुकर है

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गरहों को उच्च करना क्या होता है!

लोग अपने आप को राहु केतु से कम नही समझते-कालसर्प बन कर सभी सात गरहों को अपने पल्ले में बांध लेना चाहते यानि कि सारे गरह उच्च के हो जावे, पर यह नही समझते कि महांबली श्री हनुमान जी खुद मंगलमयी  हो कर मंगल को इतना प्रबल किया कि विश्व के दीपक सुरज को ही ग्रास बना लिया[सुरज+मंगल एक हुये मंगल की ताकत बढ़ी]इतना ही नही-सुरज के पुत्र शनी को भी  पैरों तले रौंद डाला- अब हुआ क्या-मंगलमयी हो सूरज को वस किया सुरज मंगल दोनो उच्च के बने पर उच्च के बन कर क्या करा, कुल आलम की मिल्कियत दी,सुरज की करामात -सारे काम आगे बढ़ चढ़ के किये, मंगल की करामात- महांबली योद्धा परउपकारी महावीर विक्रम बजरंगी हुये- शनी को तो चूं न करने दिया- अब शनीचर का दोसत शुकर भी चुपचाप हुवा यानि ज़र व जोरू दोनों से पू;रब पच्छिम रहे, बाल ब्रह्मचारी[मंगल उच्च-शुकर से दूरी] व त्यागी[ शनीचर को कब्जे में रक्खा सनीचर हनुमान जी के बने, न्यायी बने -बिभीषण ,सुग्रीव को इंसाफ दिलाया-]दुनिया की खुशियां दी, यानि जो भी किया दुसरों के लिये किया, अपने लिये कुछ भी नही॥
         हां मित्रों कान खोल कर सुन लो बहुत उच्च या नीच के गरह खुद के लिये परेशानी ही परेशानी खड़े करते हैं, इसलिये गरह को उच्च और उच्च और थोड़ा और उच्च करने के भूल भूलैया में मत पड़ना, ख़बरदारी रक्खो व परमात्मा की भजन बंदगी और श़ुक्राना करते रहो,  वरना चौबे जी चले छब्बे बनने दुबे बन कर आये वाली बात हो जावेगी॥

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जन्म कुंडली को देख कर जन्म समय वर्ष पक्ष महीना निकालने का आसान तरीका


जन्म समय को लेकर कंप्यूटर से कुंडली तो सभी बना लेते हैं क्योंकि आज का जमाना डिजिटल का है और लोग 4 दिन में ज्योतिषी बन जाते हैं व्हाट्सएप पर फेसबुक पर लेकिन सॉफ्टवेयर से ज्योतिषीय गणित कैलकुलेशन बहुत आराम हो जाता है लेकिन फिर भी भारतीय गणित ज्योतिष का मैनुअली ज्ञान होना भी जरूरी है इसी पर आधारित है मेरा एक यह छोटा सा लेख की जन्म कुंडली को देख कर उससे जन्म समय कैसे निकाले।
  समझाने के लिए मैंने अपने हाथ से एक प्रश्न कुंडली और एक लग्न कुंडली बनाकर यह समझाने की कोशिश की है कि जन्म कुंडली से समय कैसे निकाला जाता है

वर्ष मालूम करना- अभी की कुन्डली(प्रश्ण कुंडली) में देखो कि सनीचर कहाँ बैठा है, आज की कुन्डली(28/04/2014)देखने पर पता चला कि सनीचर तुला राशी में बैठा है। और जब कुन्डली देखा तो पता चला कि सनीचर वृश्चिक राशी में बैठा है[ सनीचर १ राशी में अढ़ाई साल रहता है व राशी चक्कर(१२ राशी) को लगभग ३० साल में पूरा करता है] सो वृश्चिक व तुला में ११ राशी का फ्रक़ मालूम हुआ( सनीचर जनम कुंडली में जिस राशी बैठा हो उस राशी को छोड़ कर अगले राशी से आज की कुंडली की में सनीचर जिस राशी में बैठा हो तक की राशी तक गिनो). सनीचर को राशी में अढ़ाई साल मान कर गुणा(Multiply) किया [ 2.5×11=27.5] तो साढ़े सत्ताईस साल फ़रक मालूम हुआ जिसका मतलब जातक का जनम( 26-27साल का है)1986/87 का होगा/ अगर अधेड़ उम्र सा दिखे तो 1956/57(87 में 30 घटा-minus दो, क्योंकि हर 30 साल बाद उसी राशी में आयेगा जिसमें वह बैठा है)अगर बूढ़ा हो तो 1926/27 का जनम होना चाहिये पर इसमें एकाध साल का फऱक हो सकता है॥
      सही वर्ष मालूम के करने के लिए अब गुरू की मदद लो गुरू १ राशी को एक साल में पूरा करता है, जनम कुंडली में गुरू मीन का है और राहु के साथ है। आज की कुडली में गुरू मिथुन का है॥ जनम कुंडली में सही वर्ष पता करने के लिये बाकी गरहो को स्थिर(सुरज+शुकर11,शनीचर8, चंदर6,बुध+मंगल12,केतु3 व राहु9 में)रखकर गुरू को उलटा घुमाया- तो गुरू को 1987 में मीन राशी में पहुचाने पर पता चला कि गुरू मीन में 1987 में राहू के साथ था/ सो अब 1986/87 की दुविधा समाप्त हो गई, पक्का हो गया कि गुरू मीन में राहु के साथ 1987 में था॥(कुंडली मिल गयी)
     
माह का पता करना-बैसाख का सूरज घर पहिले(मेष राशी) में(लाल किताब गुटका), सुरज मेष में बैसाख में रहता है सो वृष में सूरज जेष्ठ महीने का हुआ॥
सूरज जनम कुंडली में वृष में है, सूरज एक राशी में एक महीना रहता है। वृष(2 राशी) में सूरज बैसाख से अगला महीना जेष्ठ का हुआ/ सो जातक का जन्म जेष्ठ महीना माना॥
सो जनम जेष्ठ महीना 1987ईसवी का स्पष्ट हुआ.
(संक्राति में सूरज राशी बदल लेता है, संक्राति अंग्रेजी महीने की 12 से 17 के बीच होता है)
जन्म तिथी व पक्ष पता करना- कुंडली में सुरज व चंदर की दुरी का पता करो(जहाँ सूरज वहाँ अमावस जानो क्यो कि अमावस में सूरज व चंदर साथ होते हैं) यहाँ सूरज(वृष) से  चंदर(धनु) तक सात ख़ानो(राशी) का फर्क हुआ/ चंदर एक राशी में अढ़ाई तिथी रहता है, 2.5×7=17.5 साड़े सतारा तिथी हुई(30 को अमावस व 15 को पुरनमासी कहते है) सो १७.५ का मतलब कृष्ण पक्ष की द्वितीया या तृतीया/ तिथी को जनम हुआ॥अगर चंदरमा का अंश पता हो या वार का पता हो तो तिथी बिल्कुल स्पष्ट हो जायेगी
सो अब पता चला कि जनम द्वितीया/तृतीया जेष्ठ कृष्ण पक्ष में 1987 को हुआ यानि 12-13/जून/1987 में हुआ॥
समय का पता करना- सूरज सुबह में लगन/पहिले ख़ाने में,(जिस राशी में सूरज उदय हो वही लग्न उदय(सुबह का) कहते है सीधी जुबान सुबह होना कहते हैं/ जेष्ठ महीने मे वृष लगन उदय है क्योकि यहा पर सूरज वृष में है) दोपहर में 10 ख़ाना में, शाम को ख़ाना 7 में व आधी रात को ख़ाना न.4 में होता है। यहा पर सूरज ख़ाना न.11 में वृष राशी में है व लगन/ख़ाना 1में करक राशी है। 1लगन लगभग 2 घंटे का होता है,  सो लगन व सुरज वाले ख़ाने में 2 ख़ाना का फऱक है इसका मतलब जातक का जनम सुरज उदय होने के ४ घंटे बाद हुआ होगा॥ जेष्ठ महीने में लगन आमतौर पर सुबह ४ बजे उदय होता है, ४ घंटे बाद यानि सुबह ८ से १० के बीच जनम हुआ है॥
(अब यह पता चला कि जातक का जनम 12-13/जून/1987 में ८ से१० के दरमियान हुआ था)
अयन का पता करना- मकर के सूरज से कुछ पहले उत्तरायन व करक से कुछ पहले दक्षिणायन होता है, सो यहाँ वृष का सुरज होने के अयन उत्तरायन हुआ॥
ऋतु का पता करना - जेष्ठ व आसाढ़ ग्रीष्म ऋतु होती है सो ऋतु ग्रीष्म हुआ॥
सो इसी तरह बाकी योग करण व नक्षत्र पता भी लगाया जाता है॥
इस तरह स्थूल तरीके से कुंडली के बारे में जानकारीयां हासिल की जा सकती है, पर बारीकी से देखने के लिये ग्रह स्पष्ट होना बहुत जरूरी है॥
       (मेरे पास कई बार टेवा/जन्मपत्री दिखाने के लिए ज्योतिष प्रेमी जन पुरानी हस्त लिखित घसी पिटी हुई/आधी फटी हुई टेवा लेकर आ जाते हैं तो मैं इसी विधि से जनम तारीख निकाल कर दशा अंतरदशा के बारे में बता देता हूँ- मैने इसे यहाँ लाल किताब गोष्ठी में पर आप सभी ज्योतिष प्रेमी जनों सेवा में बहुत मेहनत से हिन्दी में टाइप करके आप के प्रस्तुत किया है/किसी तरह की गलती होने पर मुझे अवगत करायें, मै आप सभी का धन्यवादी होऊंगा)
نجومی دلجیت سنگھ
(Najoomi Daljiet Singh)
नीचे दोनो कुन्डली दी गई है॥
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वक़्त-ए-रुख़सत(मौत-मुक्ति-आवागमन)

वक़ते रूख़सत
जब सनीचर की रेखा वाली उंगली यानि मध्यमा के नाखून पर राहु नीले रंग की जाल बना देवे या बदन से शनीचर के दोस्त शुकर की देशी घी की खुस़बू आवे तो समझ लेवे की गुरू समाधि व राहु जम जन्दार दोनो हिल पड़े है, ख़ाना नम्बर एक का सफ़र ख़तम हुआ यानि अब दीवाने परवाने ने सूरज की कदम बढ़ा दिये है ....अगर गुरू का चेला(केतु) ख़ाना नं. ९ या १२ में बुलन्द हो तो १०८ की माला सिद्ध व नसीब-ए-जन्नत- और अगर राहु का धुऑ ही रहा तो पवन गुरू राहु की धुऑ से निकले पर सामने खाली आकाश पाया गर्म(सुरज) हवा(गुरू) के मिलने पर चंदर का पानी मिला यानि आसमान से गिरे ख़जूर पर अटके वाली बात बन गई व ख़ाना नं१ में आकर फिर से १०८ की माला फेरनी सुरू कर दी पर राहु की शरारत क्या पता? १०८ की माला पूरी हो कि ना हो!
पहले गुरू कि पहले चेला - गुरू के कहने से चेला नही होता, चेला के कहने से गुरू होगा -चेला (केतु) के कायम[९ व १२] होने पर ही माला(मनुष्य जनम) सफल होगी॥ वर्ना मुड़ मुड़ खोती(गधी) बोहड़ नीचे आती रहेगी - केतु कायम के लिए यह ज़ुमला याद हमेसा धियाण रहे "ईबादत कर ईबादत कर, करन नाल गल्ल बनदी है; किसे दी अज्ज बनदी है, किसे दी कल बनदी है" वरना माला पूरी न होवेगी-धन्यवाद

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ख़ाना न:२ शणी वाले टेवे को नंगे पैर धर्मस्थान जाना क्यों लिखा लाल क़िताब में?


ख़ाना न:२ पक्का घर गुरू का, शनी(दौलत-अमीरी) गुरू के घर खराबी नही करता पर गुरू (त्यागी व मलंग फ़क़ीर) शनी के घर खराबी करता है।
पर जब शणी २ में आया तो गुरू ने नज़रे टेढ़ी की पर घर का मालिक शुक्र है व शुक्र ठहरा शणी का मित्र , मित्र ने मित्र की मदद की.
पर जब शादी(शुक्र) का वकत आया तो शुक्र ने शणी(किशमत रेखा का मालिक) से मदद मांगी- शणी की मदद के बगैर शादी होगा नही। 
    शुक्र ने शणी की मदद लेकर अपना ऊल्लू सीधा कर लिया, शनी तो गुरू फूटी आंख नही सुहाता पर अब शणी की इस करतूत ने गुूरू को पूरा आग बबूला कर दिया(शणी बेचारा फस गया जैसे कि हनुमान जी झगड़ा तो भगवान श्री राम जी और रावण के बीच था पर अपनी पूँछ जला कर बैठ गये). गुरू ने घर के मालिक शुक्र को कुछ कहने की बजाय(क्य़ोकि शुक्र तो घर का ठहरा/बाहरी को बाहर का रास्ता दिखा दिया)  शणी की जैसी की तैसी करी (खाना न:2 धन/ससुराल के घर से चलता कर दिया).
     अब शणी(कारोबार मंदा हुआ) परेशान/मंदा हुआ और जब शणी मंदा(कारोबार- क़िसमत) हुआ तो शुक्र (संसार-स्त्री-सुख) को परेशानी क्योंकि बगैर शणी(धन-कारोबार) के शुक्र (स्त्री-संसार-भोग) की परेशाणी बढ़ी।
    तो अब जाकर शणी+ शुक्र दोनो की अक्ल ठिकाने आयी पर शणी घर में घुसे तो कैसे घुसे क्य़ोकि गुरू तो शणी को पहले ही देखना नही चाहता था पर अब तो "नीम व ऊपर से करेला चढ़ा"वाली बात हो गयी.
      और इधर शणी के बगैर शुक्र की हालत पतली हो गई। जब शणी ने मित्र शुक्र (संसार) की यह हालत देखी तो दुखी हुआ/ अब मसले का हल यही था कि शणी गुरू से माफी मांग लेवे पर शणी तो ठहरा आकड़खोर(बाप सूरज के आगे नही झुका तो और किसी सामने क्य़ो झुके) पर मित्र शुक्र के लिये शणी ने हंकार छोड़ कर गुरू की शरण में जाना ठीक समझा।
     गुरू तो कृपा का सागर है पर शणी पर कृपा नही करता है सो शणी ने(टेवे वाला) ने शुक्र (मिट्टी) की मदद ली और नंगे पैर मंदिर/गुरुद्वारा/धर्मअस्थाण मे हाज़िरी भरी /गुरू की मान मनौवल करी तो गुरू ने माफ कर दिया और गुरू के पक्के घर में शणी(धन कारोबार) को ठिकाना मिला व शुक्र(स्त्री-संसार-सुख) ने आनन्द लिया॥
उपाय✔★↩
धर्मस्थान नंगे पैर जाओ-43 से 46 लगातार(पति पत्नी दोनो).
दूध/दही का तिलक करें.
मंदिर/गुरूद्वारे मांह की दाल,काले चने,काली मिरच व चन्दन की लकड़ी दाण करें.

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ग्रहों को अलग ख़ानों में पहुचाने का तरीका

॥ॐगणेशाय नम:॥

गरहों का शुभ फल पाने के गरहों को नीचे लिखे तरीके से शुभ फल पा सकते हैं बशर्ते उन गरहों के अपने पक्के ख़ानों में उनके दुश्मन गरह ना बैठे हों॥

१. लगन में पहुचाने के लिए गरहों की चीजें गले धारण करना मुबारक होगा।

२.दुसरे ख़ाना के लियेे गरहों की मुतल्लक चीजें मंदिर/गुरूद्वारे/मसज़िद में रखना मुबारक़ होगा।

३.ख़ाना तीन के लिये गरह के मुतल्लक धातु का कड़ा/नग कलाई में पहनना मुबारक़ होगा।

४.ख़ाना चार के लिये गरह की चीजें नदी में बहाना मुबारक़ होगा।

५.ख़ाना पाँच के लिये मदरसा/स्कूली बच्चों को गरह मुतल्लक चीजें बाट देवें (वक़त तकरीबन दुपैहर का होवे)।

६.ख़ाना छठे के लिये गरह मुतल्लक चीजें खूह/कुआँ या तलाब के में दफ़न मुबारक़ होगा।

७.ख़ाना सात के लिये गरह मुतल्लक चीजें जंगल में दरख़्त की जड़ में दफ़न करना मुबारक़ होगा।

८.आठवें खाना के लिये अमावस की रात किसी शमसाण में चिता के आसपास रख देवें।

९.ख़ाना नौ के लिये गरह मुतल्लक चीजें गले या मंदिर में रख देवें।

१०.ख़ाना दस के लिये गरह मुतल्लक चीजें को चूरण बना कर पिता/दादा के ख़ाने मिलाकर देवें या किसी सरकारी इमारत के नज़दीक दफन कर दें(जहाँ पर इमारत का साया पड़ता रहे।

११.ख़ाना ग्यारह के लिये नौकरों/गुलामों (जमांदार या घर का नौकर)को खुश रखें।

१२.ख़ाना बारह के लिये गरह मुतल्लक चीजें घर की छत पर कायम रखना मुबारक़ होगा॥
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