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ल़ाल किताब व टेढ़ी खीर

"टेढ़ी खीर की कथा"
एक बार
एक गाँव में खीर भोजन के लिए लोग बगल के गाँव से
टोलियों में जा रहे थे ,खीर की चर्चा ही करते जा रहे
थे .रास्ते में एक सूरदास बैठा ,जाने बालों की बात सुन
रहा था .उसकी भी खीर को जानने और खाने
की इच्छा हुई ,उसने आवाज दी -ऐ भैया !
जरा सुनना .टोली में से एक किशोर उसके निकट
आया और पुछा -क्या है सूरदास ?सूरदास -
भैया ,जरा ये तो बताना कि ये खीर कैसी होती है ?
किशोर -उजली .सूरदास -यह उजली कैसी होती है ?
किशोर -बगुले जैसी .सूरदास -भैया ,यह
बगुला कैसा होता है ?किशोर असमंजस में पड़
गया ,फिर उसे एक युक्ति सूझी ,वह सूरदास के एकदम
समिप चला गया और बगुले जैसी टेढ़ी आकृति अपने
हाथ से बनाई और सूरदास का हाथ समूचे आकृति पर
घूमा दिया .जैसे -जैसे सूरदास
आकृति को टटोलता गया ,आश्चर्यित और
बिस्फारित होता गया और बोला -भैया ,ये तो बहुत
टेढ़ी है ,गले में फँस सकती है ,आप ही लोग जाओ इस
खीर को खाने .जरा सोचिये ,न समझ में आये तो खीर
जैसी कोमल ,मधुर और अमृत भोजन भी टेढ़ी और गले में
अटकनेवाली हो जाती है.....
आजकल लाल किताब भी कुछ विद्वानों की कृपा से इस टेड़ी खीर की तरह
बनता जा रहा है! आपके क्या विचार हैं॥

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